चल ग़ालिब कहीं और चलते हैंयहां हर नागिन के पीछे दो नाग बैठे हैं
आखिर कब तक किस्सा बनके रहोगे ,
जल्दी से हिस्सा भी बनजाओ मेरी जिंदगी का ..!!
कितना तुम कमाल करते हो ,,होठों से ही चूमते हो होठों से ही कौसते हो ।।
अंजाम की ख़बर तो मीरा को भी थी
बात सिर्फ़ मोहब्बत निभाने की थी..!
काम पड़ सकता है,
आधे रिश्ते तो लोग इसी लिए निभा रहे हैं...
धीरे धीरे सब छोड़ जाते हैं,
दिसंबर तो बस एक महीना है....
किसी व्यक्ति से बदला लेने का सबसे अच्छा तरीका है
कि उसके जैसा न बनिए।
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगेतुम्हें याद है कुछ ये शब्द किस के थे.!
ग़ैरों की बात छोड़िए, ग़ैरों से क्या गिलाअपनों ने क्या दिया हमें, अपनों से क्या मिला।
~ कैफ़ी आज़मी
कब्र की मिट्टी हाथ में लेकर सोच रहा था
लोग मरते हैं तो गुरूर कहां जाता है!
लाज़मी है उसका मुझे यूँ भूल जाना ऐ यार ! हमने कहा था उससे 'बुरे लोगों को भूल जाया करो'...
सुनो लड़कियों घर से भागो
प्रेमी के साथ नहीं।
इतिहास
भूगोल
विज्ञान
साहित्य की किताबें लेकर,
जब इन किताबों को सीढ़िया बनाकर
मारियाना की गर्त से लेकर,
चांद पर पहुंच जाओगी।
तब कोई भी प्रेमी भगाएगा नहीं
बल्कि
ख़ुद ही चोरी छिपे किताबें देगा
बजाय फूल और झूठी प्रसन्नता के।
हर दिन होता "चीर" हरण है, तुम कितनी "द्रौपदी" बचाओगे,
इन "कौरव" की औलादों पर, अब तुम कब "चक्र" चलाओगे..!!
विरक्ति
परिवार, हालात और रिश्ते जो संभालना चाहता है,वही झुक जाता है,वर्ना स्वाभिमान तो सुदामा का भी कहाँ कम था।
शिकवे और शिकायतों में क्या रखा है!वक़्त ही कुछ ऐसा है कि….अपनों ने ही अपनों से दूरी बनाए रखा है।
जो बातें हम पी जाते हैं,वो बातें हमें खा जाती है..!!
हंसता रहता हूं मैं हरदम तो, सबको लगता है सुलझा हूं,लेकिन समस्याओं कि भूल-भुलैया में, मैं खुद से खुद में उलझा हूं..!!
नहीं मांगती प्राण प्राण में , सजी कुसुम की क्यारी
स्वप्न स्वप्न मे गूंज सत्य की , पुरुष पुरुष मे नारी
रामधारी सिंह दिनकर
ये ज़िन्दगी इतनी भी आसान नहीं, जितनी हम समझ रहे थे,
इश्क़, समझौते और जिम्मेदारियों के तजुर्बे रोज़ मिल रहे थे..!!