हालात बिगड़ने लगे तुम बिछड़ने लगे
हम दोनों को हालातो से लड़ना था,
तुम हमसे लड़ने लगे
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कुछ आस थी कभी, कभी कुछ वहम था 
एक दरिया सा और एक विशाल सागर सा 

वो आस भी ले डूबी और वहम भी ले डूबा 
कभी गहरी आग सा तो कभी गहरे पानी सा ...
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ख्वाहिशों के पिटारे पर ज़िम्मेदारी की आरी चल जाती है,
जबतक समझता है वो कर्मों को तबतक उम्र ढल जाती है..!!
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शब्दों का भी तापमान होता है साहब ,
ये सुकून देते हैं तो जला भी सकते हैं।।
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मयस्सर तुम्हारा साथ होता तो श्रंगार के चारचांद लगा देता,
और ना बांध पाती अगर तुम साड़ी,
तो पल्लू मैं बना देता..!!
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मन ऊदास है
ना जाने कैसी 
ये प्यास है,,,,

निगाहे ढूंढती है जिनको
ना जाने वो 
किसके पास है,,,,
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ज़िन्दालाश बना देने वाली,
समय की मार से अंंजान था मैं,
रूह सहमी थी परिस्थितियां देखकर,
जिस्म से बेजान था मैं..
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इंसान को ये 6 चीजे बर्बाद कर देती है..
नींद, गुस्सा, डर, थकान, आलस्य और काम टालने की आदत..!!
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चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले।
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मैं तो वक्त से हारकर सर झुकाये खड़ा था,
और सामने खड़े लोग खुदको बादशाह समझने लगें...
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दर्द छुपाते छुपाते,
दर्द में जीने की आदत हो गई !

” मैं शायर तो नहीं “

कुछ यहां से, कुछ वहां से…

सबका धन्यवाद !

चेहरे पर चेहरा लगाना पड़ता हैं,
मैं ठीक हूं ये कहकर मुस्कुराना पड़ता हैं !