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मेरी "भक्ति" का कुछ ऐसा "असर" हो जाए, मैं बोलूं जय "श्रीराम" और "हनुमान" प्रकट हो जाएं..!! विरक्ति

रात इकाई नींद दहाई ख़्वाब सैकड़ा दर्द हज़ार!

जो वक्त नहीं दे सकता.. वो साथ कैसे देगा..!!

संभल कर चल नादान, ये इंसानों की बस्ती हैं ... ये रब को भी आजमा लेते हैं फिर तेरी क्या हस्ती हैं ...!!!

मेरे संग-तराश तुने ये अजीब बुत तराशाइसे पूजता रहूं मैं यही दिल की हसरतें हैं

ये आईने कभी आँखों को पढ़ नहीं पाते ये लबों की हँसी से आगे बढ़ नहीं पाते है जिनके दम से ज़माने में रंग और ख़ुश्बू वो फूल अपने ही काँटों से लड़ नहीं पाते मालविका हरिओम

लोग देखते ही रहे कि हमें टूटा हुआ देखें,और हम थे कि दर्द सहते-सहते पत्थर के हो गए।

कहां से लायी हो इतनी खूबसूरत आंखें…सारे जहां की खूबसूरती समेटे हुए..कौन कहता है कि छोटे कपड़ों में ही सुंदर दिखा जा सकता है.. मर्यादा , संस्कारों में रहकर पूरे कपड़ों में भी सिर्फ आंखों से ही चांद सी खूबसूरत...

यूं तो दिखावे के लिए लोग बहुत ही दिल से मिलते हैं पर जो दिल से मिलते हैं वो बड़ी मुश्किल से मिलते हैं !!!

राजा महराजाओं कि रियासतें भी खाक में मिली हैं, दौलत, रूतबा, प्रतिस्पर्धा सब इसी राख में मिली हैं..!!

खुश रहने के लिये जिंदगी में खुद के स्थिति क्षमता देख कर ही फैसले लेने चाहियेलोगों को खुश करने या दिखाने के लिये गये फैसले हमेशा दुख के कारण बनते हैं

किसी के लिए जरूरी होना,और फिर गैर जरूरी होनाहाँ , यही तो जिंदगी है…

गांव की मिट्टी के पले बढ़े हैं,हमें अदाएं कम और मर्यादाएं ज्यादा पसंद हैं….

संघर्षों की समर भूमि में, हमसे पूछो हम कैसे हैं, कालचक्र के चक्रव्यूह में, हम भी अभिमन्यु जैसे हैं !

सुकून मे इसलिए भी हु क्युकी,,, धोखा सिर्फ खाया है दिया नहीं,,,

हे भगवान ये क्या हो रहा है। चक्र कहां है आप का।

फुरसत अगर मिले तो मुझे पढ़ना जरूर... नाकाम जिंदगी की मुकम्मल किताब हूं मैं...!!

गरीबी शिक्षा सस्ती करने से कम होगी ,मुफ्त के राशन से नही।

आवाज तक नहीं हुईऔर सब कुछ टूटकर बिखर गया....!!

लोग इंतजार में थे मुझे टूटा हुआ देखने को, एक मैं था जो सहते सहते पत्थर का हो गया।


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