तुलसी भरोसे राम के, निर्भय हो के सोए।
अनहोनी होनी नही, होनी हो सो होए।
तुलसीदास
मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता
एक ज़र्रा भी तो बेकार नहीं हो सकता ।
यूं तो दिखावे के लिए लोग बहुत ही दिल से मिलते हैं पर जो दिल से मिलते हैं वो बड़ी मुश्किल से मिलते हैं !!!
न्यूज़ देख रहा था
ना मुझे इजराइल से बैर है
ना फलीस्तीन से मोहब्बत
दोनो तरफ से मरने वालों की
संख्या बताई जा रही थी
जिसमे औरते मर्द मासूम थे
टूटते घर थे
कुछ लाशें थी
कहीं आग लगी थी
कहीं रुदन था...
कुछ भी अच्छा सा रख लीजिए मेम, वैसे भी करना उसके विपरित है !!
अखबार सी हों गई है जिंदगी
हर रोज़ नई ख़बर
तोड़ कर मैं सारे बंधन,परिंदा हो जाऊँजी चाहता है फ़िर से, मैं ज़िन्दा हो जाऊँ
जबरदस्ती की नजदीकी से,
सुकून की दूरियां अच्छी हैं....
तुम बदले तो गम भी कहाँ पुराने से रहे,तुम आने से रहे तो हम भी बुलाने से रहे ।।
ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है,
अपना सुख उसने अपने भुजबल से ही पाया है।"
रामधारी सिंह 'दिनकर'
सुविधाएं अगर हमारी आजादी को गिरवी रख लें,
तो उन सुविधाओं का सुख सहूलियत मात्र नहीं होता,
गुलामी में बदल जाता है।
चित्रा मुग्दल
मोहब्बत रंग दे जाती है जब दिल दिल से मिलता हैमगर मुश्किल तो ये है दिल बड़ी मुश्किल से मिलता है
वक्त भी कैसी पहेली दे गया
उलझने सौ और जान अकेली दे गया
प्रतिभा सब में है,पर लक्ष्य तक केवल वही पहुंचेंगें,जो आकर्षणों से बचे रहेंगे।
उसके लिए कविताएं लिखना और फ़िर उन्हें जला जाना, उससे मोहब्बत करना और फिर उसे बिना बताएं मर जाना !
एक तेरा कदम एक मेरा कदम,
मिल जाए तो जुड़ जायें अपना यह वतन…
कितने शिकवे हैं ज़िंदगी के साथ, फिर भी मरने को दिल किसी का नहीं करता !
स्त्रीतत्व को छूना भी एक कला है,स्त्री काया नहीं हृदय है..
मुझे पल भर के लिए आसमान को मिलना थापर घबराई हुई खड़ी थी…कि बादलों की भीड़ में से कैसे गुज़रूँगी…
ज़िन्दालाश बना देने वाली,
समय की मार से अंंजान था मैं,
रूह सहमी थी परिस्थितियां देखकर,
जिस्म से बेजान था मैं..