मसला ये नहीं की लोग परवाह क्यों नहीं करते,
मुद्दा ये है की हम उम्मीद क्यों करते हैं...
गिरगिट तो बेवजह बदनाम है,
असली रंग तो अपने बदलते हैं...
प्रेम और अटैचमेंट में फर्क होता है...
प्रेम स्वतंत्र होता है..!!
बुरा वक़्त भी गुज़र ही जाता हैबस रब को हमारा सबर आजमाना होता है!
उसूलों पे जहाँ आँच आये वहां टकराना जरूरी है, जो जिन्दा हों तो फिर जिन्दा नजर आना जरूरी है !
जो अपने लक्ष्य के प्रति वफादार होते हैं, मंजिल सिर्फ उन्हीं के कदम चूमती है....
मैं तुम्हरे साथ हूं कहने में और,रहने में बहुत फर्क होता है!
गीत ग़ज़लों में शामिल गर ना हो सके,
तो तुम्हारे दर्द में बसर हम ज़रूर करेंगे।
नेहा यादव
कुछ लोग ऐसे मिले जिंदगी मेंसाथ बैठकर हंस गए और पीठ पीछे डंस गए
खुश रहने का बस एक ही मंत्र है
उम्मीद बस खुद से रखो किसी और इंसान से नहीं।
अब्दुल कलाम
सहनशील होना अच्छी बात है,
परन्तु अन्याय का विरोध करना उससे भी उत्तम है !
मन करे कभी कुछ अच्छा करने का,
तो हांथ किसी विधवा का थाम लेना,
किसी बेसहारा अभागी स्त्री कि,
मांग फिर से तुम संवार देना,
और ये कैसा समाज है जो बेटे को,
दूसरे विवाह के लिए हां कहता है,
वहीं दिखाकर डर घर कि इज्ज़त,...
मेरे कानों का वो झुमकाहमारे इश्क़ की छन छन पेइतराता है
तेरे हाथों की छुअन सेजाने क्यूँ अब भीशर्माता है
जब हक़ीक़त से रूबरू हुआ
तब मालूम हुआ कि
बातों से ही अपने थे “अपने” !!
जिंदगी भर डर डर के रिश्तों को,
निभाने से बेहतर है अलग हो जाना...