जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है,
उसने मानो सारे जगत पर विजय प्राप्त कर ली।
महर्षि वेदव्यास
बहादुर वह नहीं है जो भयभीत नहीं होता,
बल्कि वह है जो इस भय को परास्त करता है।
बुद्धि का विकास मानव के अस्तित्व का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए।
ताश में जोकर और अपनों,
की ठोकर अक्सर बाज़ी घुमा देते हैं....
इश्क के धागे से बांधा ही नहीं मैंने तुझे कभी…रूह के हर रेशे से जुड़ा है तेरा मेरा रिश्ता..!!
आहिस्ता बोलने का उनका वो अंदाज भी गजब था,
कानों तक को खबर न हुई,
और दिल ने सब समझ लिया।
फ़रिश्ते ही होंगे जिनका इश्क़ मुकम्मल हुआ,इंसानों को तो हमने सिर्फ़ बर्बाद होते देखा हैं..
गांव की मिट्टी के पले बढ़े हैं,हमें अदाएं कम और मर्यादाएं ज्यादा पसंद हैं….
जैसा तुम सोचते हो ना वैसे तो हम हैं नहीं और जैसे हम
हैं ना वैसा सोचने की तुम्हारी औकात नहीं है..!
भटका हू जीवन कि राहो मे मंजिल कि कोई ठौर नहीएकाकी जीवन जीता हू मेरे पास खुशियां और नहीतुमको साथ ले चलू तो वह बात आन कि आती हैदुखदर्द, कष्ट तुम भी सहो तब बात सम्मान कि आती है
और न...
थोड़ी सी आवारगी भी जरूरी है जिंदगी में,
कैद में रहकर परिंदे अक्सर उड़ना भूल जाते है।
अगर मां-बाप तुम्हारी वजह से खुश हूं,तो अपनी जिंदगी के बादशाह हो तुम..!