खूब समझती है वो रूदन अपने लाल का,"मां" पृथ्वी पर साक्षात् भगवान होती है,
घर, समाज, ईश्वर किसी का उसे भय नहीं,अपनी औलाद में ही उसकी जान होती है,
और नहीं करती फिक्र कभी धूप - शीत की,हर आफत से बचा ले...
मेरे ख्वाबो का कोई आशियाना नहीं हैं , अपने दर्दों को मुझे मिटाना नहीं हैं , मेरी मजबूरियों का फ़साना भी क्या अजीब हैं , मुझे रोना हैं पर किसी को बताना नहीं हैं ..
जब डूब रही थी कश्ती और दूर था किनारा,
तब भी भरोसा सिर्फ खुद पर था हमारा....
कहता है, वो महफूज रहे वो घर के बंद दीवारों में, बता...द्रौपदी कहा लूटी थी, घर मे या बाजारों में...!!
"तुम कर लो नजरंदाज अपने हिसाब से""हम तो इश्क़ मोहब्बत बेहिसाब करेंगे"
रास्ते ख़ूबसूरत हो तो मंज़िल की परवाह क्यूँ करनादिल में अगर सुकून हो तोबेचैनियों की फ़िक्र क्यूँ करना
दूसरों की आंखों में आंसू लाने वाले ये क्यों भूल जाते हैंकि भगवान ने दो आंखें उन्हें भी दी हैं और कर्म समय चक्र के साथ घूमकर एक दिन हमारे समक्ष अवश्य आते हैं।
तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा करसरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर
~अमीर मीनाई
अच्छे कपड़ों में कुछ स्वाभिमान का अनुभव होता है।
मुंशी प्रेमचंद
नहीं पढ़ीं जातीं सम्पूर्ण कविता अब उनसे'दो' पंक्तियाँ दो उन्हें, किताबें वापस ले लो।
कभी-कभी शब्दों को पढ़ते व शब्दों को गढ़ने से क़िताब तो पूर्ण हो जाती है,किंतु कहानी अधूरी ही रह जाती है।।
सब बीत जाता है
पल हो
दिन हो
महीना हो
या फिर हो साल
जो नहीं बीतता वो है सिर्फ़
तेरा ख़्याल