हम चाह के भी खण्डहर ना हो पाए, मेरी बुनियाद में, तेरे नाम के पत्थर जो लगे हैं...
मैं कितना भी गैर जरूरी हो जाऊं तुम्हारे लिए मेरे आंसुओ का बोझ कम ना होगा, और रह लो तुम कितना भी मेरे बिना खुश, मेरी सिसकियों का कर्ज़ तुम्हारे ज़िन्दगी से कम ना होगा...!!
वो करता है जब भी तारीफ़ मेरी... हाय,चेहरा मैं उसके सीने में छुपाती हूं..!!
जो मेरी ज़िंदगी की किताब का दस पन्ना भी न पढ़ा सका हो……. उसकी नज़रों में हम ख़ुदगर्ज़ नज़र आ रहे हैं……..
मरना है इक रोज सभी को ही बस ख्वाहिश इतनी है उस पल हाथों में हाथ बस तेरा होरहे तू सामने मेरे और मेरी आंखों को दीदार सिर्फ तेरा हो.... जा सकूं मैं इस दुनिया से चैन से इस तरह...