काफ़िर हूँ सर-फिरा हूँ मुझे मार दीजिए मैं सोचने लगा हूँ मुझे मार दीजिए   है एहतिराम-ए-हज़रत-ए-इंसान मेरा दीन बे-दीन हो गया हूँ मुझे मार दीजिए   मैं पूछने लगा हूँ सबब अपने क़त्ल का मैं हद से बढ़ गया हूँ मुझे मार दीजिए   करता हूँ अहल-ए-जुब्बा-ओ-दस्तार से...

#वफा का समुन्दर कभी रूकता नहीं इश्क़ मे चला हैं वो कभी झुकता नही, मरहम धीरे से ही लगाना मेरे जख्मों पर, तूं ये ना समझ मेरा दिल दुखता नहीं...!!!

कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए

निभाने वाले रास्ते ढूंढते हैं और छोड़ने वाले बहाने...!!!

मैं वो चिराग हूँ,जो आँधियों में भी रोशन था...खुद अपने घर की हवा ने,बुझा दिया है मुझे...

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