लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
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क्रोध से शुरू होने वाली हर बात,
लज्जा पर समाप्त होती है
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दिल का मामला है तो,
दर्द से बनाकर रखिएगा हुज़ूर!

किसी-न-किसी मोड़ पर,
ठोकर ये खाएगा ज़रूर !
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मुझे ये रूह से मिलने का ढोंग नईं करना
मेरे बदन को तेरे स्पर्श की ज़रूरत है
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तुम से नाराज़गी नहीं कोई ,
हम ख़फ़ा हो गये हैं अब खुद से ।
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“ये फ़र्ज़ रहे ध्यान में,
लिखा है संविधान में,
अगर कोई भी बात,
तेरा मन गई कचोट कर,
तू वोट कर,

ये प्रश्न तेरे बल का है,
सवाल तेरे कल का है,
समय ये फ़ैसले का फिर से,
आ गया है लौट कर,
तू वोट कर”
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ज़िंदगी को जंगल के
उस पेड़ की तरह बनाओ,
जो हर परिस्थिति में
मस्ती से झूमता रहे।
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ज़िन्दगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए
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मेरी तलब के तकाज़े पे थोड़ा गौर तो कर
मैं तेरे पास आया हूं खुदा के होते हुए
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मेरे मसले अलग है दुनियां से 
मैं सबसे ज्यादा अपने में ही उलझी हूं
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