हर लम्हा सांसें बुड्ढी हो रही है
जिंदगी मौत के साये में हैं फिर भी जिद्दी हो रही है
बेवफा को बेख़बर रखना मेरी मौत की खबर से
जमाने के लिए आंसू हैं वो अंदर हस रही है!!
सुन्दरता सस्ती चारित्र महंगा, घडी सस्ती समय महंगा....!!
अल्फाजों को बयां करना मुझसे कभी आया नही..... बस गलतफहमी ये थी मुझे की उसे मेरी आंखों को पढ़ने का हुनर आता है..!!
बस साथ निभाने की जो कसमें दिलाई गई थीउसका बोझ है पर प्रेम नहीं हैअब यदि वो प्रेम की बात भी कर रहे हैतो वो इसलिए कि मजबूरी हैकि पति पत्नी हैगहराई में जाकर देखा जायतो वो सामाजिक बंधन ही...
मांँ की आंखों में देखा तो एहसास हुआ , खुदा उसे मुझ से बेहतर औलाद देता।