ग़ुरूर में बन्दा खुद को
हर इक से जुदा समझता है
अधूरा आदमी ख़ुद को
ख़ुदा समझता है
अभी ख़मोश हूं तो
ताअल्लुक़ की ज़िंदगी के लिए
ख़बर नहीं वो मेरी चुप्पी को
क्या समझता है।
जो खुद संभल कर चल नहीं सकते
ठोकर लगते ही
वो इल्जाम देते हैं पत्थर को
अच्छे निर्णय लेना अनुभव से आता है,
और अनुभव बुरे निर्णय लेने से आता है।
सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है...
संभालना था
सम्पूर्ण सृष्टि को
एक धागे में,
ईश्वर ने गढ़ी स्त्री और
यात्रा पर निकल गया!