मैंनेगुलाब कीमौन शोभा को देखा !उससे विनती कीतुम अपनीअनिमेष सुषमा कोशुभ्र गहराइयों का रहस्यमेरे मन की आंखों मेंखोलो !मैं अवाक् रह गया !वह सजीव प्रेम था !मैंने सूंघा,वह उन्मुक्त प्रेम था !मेरा हृदयअसीम माधुर्य से भर गया !
अक्सर में हवाओ के खिलाफ चलता हूँ
जिन्हें तुम जमीनी खुदा कहते हो ना,,,,,
हाँ में उन्ही मसीहाओ के खिलाफ लिखता हूँ !
सितमगर हो तुम खूब पहचानते है
तुम्हारी अदाओ को हम जानते है
दगा बाज़ हो तुम सितम ढाने वाले..
कैसे थे और
कैसे हो गये हैं हम ?
खुद को ढूँढते ढूँढते
खुद में ही खो गये हैं हम ..
ना जाने क्या लिखा हैं
किस्मत की लकीरों में ?
धड़कनों से जिंदा हैं
पर दिल से सो गये हैं हम ..
मैं नत्मस्तक तक हो गया था जिसके प्यार में,वो मगरूर मेरी बेबसी पर मूकदर्शक बनी रही..!!
क़त्ल हुआ हमारा इस तरह किश्तों में..!!कभी ख़ंजर बदल गए कभी क़ातिल बदल गए.!!
क्या मनाउ होली..
कैसे मनाउ जश्न...
जब फिलिस्तीन के..
बच्चो के जिस्म पर है..
खुन निकलता जख्म
जिंदगी के सफर में उठे
मेरे कदम एक दूजे से बात करते हैं
साघते है ज़िन्दगी का सुर मीठा
और बहते आवारा हवा से तुम्हें याद करते है
राजेश गौरी
ज्ञानी वह है, जो वर्तमान को ठीक प्रकार समझे,
और परिस्थिति के अनुसार आचरण करे।
मरना है इक रोज सभी को ही बस ख्वाहिश इतनी है उस पल हाथों में हाथ बस तेरा होरहे तू सामने मेरे और मेरी आंखों को दीदार सिर्फ तेरा हो.... जा सकूं मैं इस दुनिया से चैन से इस तरह...
मानो तो मौज है ,
वरना टेंशन तो रोज है.....!!
इस दुनिया में अगर इरादे साफ़ है..
तो समझ लो की सभी खिलाफ है...!!
बल से तो दुसमन न जीते,
छल से दोगले जीते भी तो क्या जीते......
बहुत नज़दीक आती जा रही हो ,
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या ..!!
जौन एलिया
महादेव के दरबार में सबकी समस्याओं का हल है,
कीमत केवल सच्ची आस्था और एक लोटा जल है..!!
दर्पण देख सँवर गए कितने
अपने पर ही मर गए कितने
ख़्वाबों की खेती को सच के
कीट-पतंगे चर गए कितने
प्यार वफ़ा ईमान की बातें
करके लोग मुकर गए कितने
फ़ाइलें सब्ज़ योजनाओं की
चूहे रोज़ कुतर गए कितने...
कौन कहता है मैं पसंद नहीं किसी कोमुसीबतों से पूछो वो कितना चाहती है!
आशा चाहे जितनी भी कम हो,लेकिन निराशा से बेहतर होती है।
बस पेड़ गांव के हिस्से में होते है
और
फल शहर को मिल जाते हैं ।
अक्सर दिखावे का प्यार ही शोर करता है
सच्ची मोहब्बत तो इशारों में ही सिमट जाती है