शब्दों का भी तापमान होता है साहब ,
ये सुकून देते हैं तो जला भी सकते हैं।।
बलात्कार को 'पाशविक' कहा जाता है,
पर यह पशु की तौहीन है,
पशु बलात्कार नहीं करते,
सुअर तक नहीं करता, मगर आदमी करता है।
हरिशंकर परसाई
रो भी नहीं सकते खुलकर, ये मर्द होना भी क्या मुसीबत है....
हर प्रशंसा करने वाला शुभचिंतक नहीं होता है.!
विद्वत्ता अच्छे दिनों में आभूषण,
विपत्ति में सहायक,
और बुढ़ापे में संचित धन है।
आजकल वो कुछ कहते नहीं है मशरूफियत है या नाराज़गी…?
ढूँढोगे तो सुकून खुद मे ही मिलेगा..दूसरो मे उलझन मिलती है....
हम को रोज़ी खींच लाई शहर के सहराओ में
फूल, तितली, एक लड़की रह गए सब गाँव में
आज शोहरत के सफ़र में याद आता है वो पल
अपना दिल रखा था हमने जब किसी के पाँव में..!!
ये जो मां की मोहब्बत होती है नायह तमाम मोहब्बतों की मां होती है..!!
औकात से बड़े दिखावे इंसान को, अक्सर कर्ज़ में डुबो देते हैं...
इस दुनिया में ऐसे भी शैतान है,
जो धर्म के नाम से सरकार बनाते है. !!
हसरत थी किसी के दिल में ज़िंदा रहने की
अफ़सोस हम ख़ुद के अंदर ही मर गए…
ऑॅंखे थक गई हैं आसमान को देखते देखतेपर वो तारा नही टूटता, जिसे देखकर मैं तुम्हें मांग लू!
तेरी आवाज़ मेरी रोजी-रोटी हुआ करती थी ,तू मुझे भूख से मारेगा मैंने सोचा भी ना था !!
सबके अपने सत्य हैं,
सबके अपने झूठ।
कोई कहता लाभ इसे,
तो किसी को लगती लूट।
सबके अपने कष्ट हैं,
सबकी अपनी जंग।
कोई कभी टूट जाता है,
कोई हो जाता तंग।
सबकी अपनी मान्यता,
सबका निज विश्वास।
कोई कभी...
अहंकार स्वाभाविक हैविनय सीखना पड़ता है
~ अज्ञेय
हालातों के साज़ परपीड़ा के तार सेवेदना के स्वर लिखूँगा
वक़्त की राह परज़िन्दगी की क़लम सेलम्हों की रफ़्तार लिखूँगा
वैश्या की पीड़ा सेजिस्म के खरीददारों परमैं हवस के बाज़ार लिखूँगा
तन्हाई के साये मेंअन्धेरे की क़लम सेमैं अपना संसार लिखूँगा..
हमने जिनके लिए दुआ मांगी,वो गैरों की दुआओं के तलबगार निकले,
जिनकी ख़ातिर इक वक्त में खुदा थे हम,अब हम उनकी ही नज़रों में गुनहगार निकले
जिन्होंने कभी लाख अच्छाइयां गिनाई थीं मुझमे,अब हम उनकी खातिर महज़ बेकार निकले…!!
मुझको न गिनाओ मेरी कमियां क्या हैं,
जाओ .....आईना देखो ..
और अपने गुनाह गिनो..!
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है?
रामधारी सिंह दिनकर