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सफ़र में होती है पहचान कौन कैसा है
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ये आरज़ू थी मेरे साथ तू सफ़र करता!
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बेहिसाब उधड़ी पड़ी हैं ख्वाहिशों की चादरें
कोई दर्जी सलीखे का शहर में बिठाया जाए!
गिरता न कभी चेतक तन परराणाप्रताप का कोड़ा थावह दौड़ रहा अरिमस्तक परवह आसमान का घोड़ा था
था यहीं रहा अब यहाँ नहींवह वहीं रहा था यहाँ नहींथी जगह न कोई जहाँ नहींकिस अरिमस्तक पर कहाँ नहीं
चक्रव्यूह रचने वाले सारे अपने ही होते हैं , कल भी यही सच था और आज भी यही सच है ...
कुछ भी अच्छा सा रख लीजिए मेम, वैसे भी करना उसके विपरित है !!
मैं बागी रहूंगा हमेशा उन महफ़िलों का।
जहां शौहरत तलवे चाटने से मिलती हो।।
ज़िन्दगी गुज़ारने के 2 तरीक़े है,
जो हो रहा है होने दो बरदाश्त करो,
या फिर ज़िम्मेदारी उठाओ उसे बदलने की..!
कुछ दिली हसरतें कहें या ना कहें,या अनकहा सा कह दें,
उनसे उन्हीं का जिक्र करें या फ़िर हवाओं से कह दें,
इश्क भी क्या अजीब बीमारी है,जिंदगी हमारी है पर तलब तुम्हारी है !!
जो तुम्हारा है तुम भी उसी के रहो ,
क्योंकि बेहतर की तलाश तुम्हें अक्सर अकेला कर देती है !!
नहीं मांगती प्राण प्राण में , सजी कुसुम की क्यारी
स्वप्न स्वप्न मे गूंज सत्य की , पुरुष पुरुष मे नारी
रामधारी सिंह दिनकर
झूट बोल कर कुछ पाने से अच्छा हैं ,सच बोल कर उसे खो दो …
कर्म के बीज अच्छे हो या बुरे,
अपने समय पर पेड़ बनकर फल ज़रूर देते हैं !!!
अपने मतलब के लिए,अपना बनाते हैं लोग!
कभी गिर जाओ तो खुद ही उठ जाना क्योंकि ,
लोग सिर्फ गिरे हुए पैसे उठाते हैं इंसानो को नहीं ...
आज फिर समय, मुकद्दर मेरी खुशियों से जीत गया है,
मेरी ज़िन्दगी का एक और साल तेरे बिना बीत गया है..!!
कहता है, वो महफूज रहे वो घर के बंद दीवारों में, बता...द्रौपदी कहा लूटी थी, घर मे या बाजारों में...!!
जो दिल मै होते है अक्सर... वो नसीब मै नहीं होते।।
माँ
वो बगीचा है;
जिसकी छाँव में ना जाने
कितने ही फूल
फलते-फूलते हैं।