जरा भी असर नहीं होता मुझ पर इन सांपों के ज़हर का,
मैंने अपनी जवानी में एक मशहूर नागिन को मुंह लगाया था !
ये चार दिन की जिन्दगी, किस किस से कतरा के चलूं, खाक हूँ मैं…खाक पर…क्या खाक इतरा के चलूं...
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
मैथिलीशरण गुप्त
स्त्री का सम्मान ही पुरुष की मर्दानगी हैं,और पुरुष के सम्मान में ही स्त्री की सुंदरता हैं…
जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है,
उसने मानो सारे जगत पर विजय प्राप्त कर ली।
महर्षि वेदव्यास
बाढ़, भूकंप, दंगे, चुनावफ़ौजी सिर्फ़ सरहदों पर नहीं लड़ता
इश्क़ और तबियत का कोई भरोसा नहीं मुर्शिद ,
मिजाज़ से दोनों ही दगाबाज़ हैं ..!!
कुछ सास ससुर भी अपनी बहुओं की,
खिदमतगारी का उपहार अनमोल देते हैं,
खुद कि बेटी चाहे जैसे रहे ससुराल में,
मगर बहू गलत करे तो मां बहन तौल देते हैं..!!
विरक्ति
दीप मंदिर के हों या दरगाह के,
हम फक़त रौशनी ही चाहते हैं.
आग का क्या हैं पल दो पल में लगती है
बुझाते बुझाते एक जमाना लगता है
प्रेम का अर्थ है अंत तक उन वादों को निभाना...
जो हमने अनुकूल परिस्थिति में किए थे
कोई नहीं करता प्यार मुझसे,नफ़रतों का बन गया चेला हूं मैं,न साथी न हमदर्द, न कोई रहबर,दुनिया में बहुत अकेला हूं मैं.
वो वक्त और था जब दिल से मुस्कुराया करते थे..
अब चेहरे की खुशी का दिल से कोई वास्ता नहीं..!!
ना दुआ से बढकर कोई अल्फाज़ है. ना मुस्कुराहट से बेहतर कोई इलाज है.
अपनी हक़ीक़त से वाकिफ हूं मैं
मुझे किसी और के नजरिए से फ़र्क नहीं पड़ता!
चेहरे अक्सर झूठ भी बोला करते हैं,
रिश्तों की हकीकत वक़्त पर पता चलती हैं.
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ,
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ।
एक जंगल है तेरी आँखों में,
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ।
दुष्यंत कुमार
किसी रात कभी ऐसा भी हो,हम म'र जाएं, उसे खबर न हो.
जब तक मन में खोट और दिल में पाप है !
तब तक बेकार सारे मंत्र और जाप है !
ख्वाहिशों के पिटारे पर ज़िम्मेदारी की आरी चल जाती है,
जबतक समझता है वो कर्मों को तबतक उम्र ढल जाती है..!!