नहीं मांगती प्राण प्राण में , सजी कुसुम की क्यारी
स्वप्न स्वप्न मे गूंज सत्य की , पुरुष पुरुष मे नारी
रामधारी सिंह दिनकर
वेदना छिपाकर अपनी मैं गीत खुशियों के गुनगुना रहा हूं,
समझ ना ले कोई मुर्दा इसलिए असल किरदार छिपा रहा हूं..!!
विरक्ति
निभा न सकेंगे एक भी दिन मेरा किरदार
मशवरें जो देते फिरते हैं हज़ार...!!
ये एक बात समझने में रात हो गई है
मैं उस से जीत गया हूँ कि मात हो गई है
तहज़ीब हाफ़ी
औसतन…..आदमी अपनी जिंदगी का एक वर्ष औरतों को घूरने में ही बिता देता है.
तुम्हारे जुल्मों का हिसाब लिखूं
सोच रहा हूँ
इश्क़ पर एक किताब लिखूं...
बेवजह खुश रहो... वजह महंगी है.....!!
लोग कहते है मैं बहुत गुरूर करता हूं, मैं तो बस दो चेहरे वाले लोगों को खुद से दूर करता हूं
हम खुद अकेले रह गये ,सबका साथ देते देते।
एक हुनर है जो कर गया हूं मैं
सब के दिल से उतर गया हूं मैं !
बेइमानी भी तेरे इश्क़ ने……..सिखाई थी
तूं पहली चीज़ थी जो मैंने मां से छुपाई थी
जिस दौर से हम गुजरे हैं ,
तुम गुजरते तो गुजर जाते...
एक गुमनाम सा किरदार,
हमारा भी हैं कहीं,
जज्बात तो बहुत हैं,
मगर हक एक भी नहीं,
करना तो बहुत कुछ हैं किसी एक की खातिर,
मगर मन इसी कश्मकश में हैं कि उनके जीवन में,
हमारा कोई अस्तित्व भी तो नहीं कही ..
इतरा रहे हो ज़िस्म पर नए हो इश्क़ में
रूह के तलबगार से पाला नहीं पड़ा
पत्थर दिल बनना मेरी मज़बूरी हैअगर मैं बिखर गया तो कोई समेट नहीं पायेगा।।
दो ग़ज सही ये मेरी मिल्कियत तो हैऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।
जहाँ कर्म से भाग्य बदलते,
श्रम निष्ठा कल्याणी है।
त्याग और तप की गाथाएँ,
गाती कवि की वाणी है॥
ज्ञान जहाँ का गंगा जल सा,
निर्मल है अविराम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है॥
रास्ते खूबसूरत होते हैं ,, यक़ीननपर उन यादों से ज़्यादा नहीं ,, जो सफऱ करती रहती हैं ,, ताज़िन्दगी हमारे साथ ….
नियम के बिना और अभिमान के साथ
किया गया तप व्यर्थ ही होता है।
वेदव्यास