रास आ जायेगा एक रोज़ तेरा जाना भी ,
हम किसी दुःख में लगातार नहीं रोते हैं ।।
घाट का एक पत्थर हूं मैं
मैंने नदी के हजार रूप देखे हैं!
कभी कभी सिर्फ नोट ही नहीं
खम्भे जैसे इंसान भी जाली होते हैं..!
व्यवहार सबसे रखो मगर.... लगाव हर किसी से नहीं...!!
और वो जो मुझे छोड़कर गए हैं ना वो लौटेंगे एक दिन मगर मैं उन्हें मिलूंगा नहीं.
जीवन में दो बार ही माँ बाप रोते हैं,
जब बेटी घर छोड़े,और जब बेटा मुंह मोड़े।।
कैसे जुदा कर दे उसे अपने आप से,उसके नाम का एक अक्षर मेरे नाम में भी आता है !
ये चार दिन की जिन्दगी, किस किस से कतरा के चलूं, खाक हूँ मैं…खाक पर…क्या खाक इतरा के चलूं...
मैं नहीं कहता मुझे औरों से बेहतर चाहिए
मुझ को जितनी है ज़रूरत उतनी चादर चाहिए
हैं परेशाँ इस लिए भी लोग अपनी प्यास से
प्यास की ख़ातिर सभी को इक समुंदर चाहिए
मुद्दतों भटके हैं मेरे ख़्वाब सारे दर-ब-दर...
सारा ज़माना जब खिलाफ था भूलो नहीमें आपके बाप के कंधे से कन्धा मिलाए खड़ा था
मैं उस किस्मत का सबसे पसंदीदा खिलौना हूँ,वो रोज़ जोड़ती है मुझे फिर से तोड़ने के लिए.!!
उम्मीद हाथ पकड़ने की है,और लोग हैं कि कमज़ोर नस पकड़ते हैं।
ख़तरे में है अब अपने क़बीले की आबरू ,
जो मुखबिरों में थे अब वही सरदार हो गए हैं
कुछ चीज़ों को अधूरा ही छोड़ना पड़ता है
हर बार परिस्थिति अनुकूल नहीं होती!
उसे उस हद तक चाहो ,
वो भी बोले अच्छा ठीक हैं करलो ..!!
बहुत ज़्यादा फ़र्क पड़ने के बाद..
फ़िर कुछ ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता..!!
फिर आखरी बार भी नहीं मिला मुझसे, जो मिलने वाला था "उम्र भर के लिए"
ख्वाहिशों ने जब भी कोशिश की उड़ने की,
परिस्थितियों ने "पैरों" में बेड़ियां डाल दिया..!!
विरक्ति
कंपटीशन इतना बढ़ गया है
कि अगर हम किसी को अपना दुःख बताते हैं
तो वो हमसे ज्यादा बताने लगता है।।
खलिश तेरी "आंखों" कि बयां करती है,
तूने बसाए हैं "दुखों" के समंदर इनमें..!!
विरक्ति