"हुनर" सड़कों पर तमाशा करता है…और "किस्मत" महलों में राज करती है..!!
ये बारिश ये ठंडी हवा रिमझिम और ये मौसम,अगर तुम दूर ना होती पगली तो मिल के चाय पीते!!
शिद्दत से मेहनत करो यार… प्रेमिका केवल संभोग सुख दे सकती है, सफ़लता नही…!
बेशुमार इश्क़ है तेरे लिए मेरी इन आँखो में,बस नज़र भर के देख लो मुझे तुम… !!
ना छेड़ क़िस्सा -ऐ- उल्फ़त का ,
बड़ी लंबी कहानी है ,
मैं ग़ैरों से नहीं हारा किसी अपने की मेहरबानी है !
हारना तो है एक दिन मौत से,
फिलहाल जिन्दगी जीना सीख लो...
कोई व्यक्ति कितना ही ख़ास क्यों न हो,
उसे एक पल में त्यागने कि क्षमता तुम्हारे भीतर अवश्य होनी चाहिए।
जिंदा आदमियों के अंदर,कई बार मारे हुए लोग भी रहते हैं….
शादी उसकी भी होगी, और मेरी भी होगी,लेकिन "हमारी" होती तो क्या बात थी.
बड़बोले देश बचाने में लगे हैं।
बड़बोले यह नहीं बोलते कि
अगर इस देश को बचाना है
तो उन बातों को भी बताना होगा
जिनपर कभी बात नहीं की गई
जैसे मुट्ठी भर आक्रमणकारियों से
कैसे हारता रहा है ये
तैंतीस...
उसने हमें छोड़ा शायद कदर नहीं थी इश़्क़ की,हम अपनी वफाओं के बादशाह तो आज भी हैं..!!
फिर यूँ हुआ कि वक़्त ने मसरूफ़ कर दिया ,
वरना हमारे पास ज़माने के ख़्वाब थे ।।
ज़िंदगी के रास्तों मेंखुद से चलने,गिरने,उठने,का हुनर सीख लो,क्यूॅंकि सहारे कितने भीभरोसेमंद क्यूॅं न हों,एक न एक दिन साथछोड़ ही जाते हैं!!!
अचानक आ जाती है मृत्यु की ख़बरअचानक डूब जाता है शहरअचानक ढह जाती हैं इमारतेंअचानक चुभ जाता है कांटाअचानक फैल जाती है आग जंगल में
सारी त्रासदियां अचानक आती हैंनहीं आता कभी कोई सुख अचानकजैसे तुम कभी नहीं आयी।
~गौरव गुप्ता
समझौते ही करने होते तो व्यापार करते
ना समझ थोड़े ही है जो तुझसे प्यार करते
रिश्ते भी इमारत की तरह होते हैं ,
हल्की-फुल्की दरारें नज़र आए तो इमारत तोड़िये नहीं
मरम्मत कीजिए !
एक ही शख्स समझता था उसे,
और एक ही शख्स समझता था मुझे !!
फिर ये हुआ की वो भी समझदार हो गया,
और हम उसके सामने बच्चे ही रह गये !!
गिले शिकवे मिटा कर सोया करो मौत मुलाकात का मौका नहीं देती…
मरने वाला तो मर गया लौट कर नहीं आएगापर अपनी सोचो उसके चले जाने की टीस जीने नही देगी होगी घुटन पर कह नहीं पाओगे
लाख रोओगे पर उसे वापस...
माँ
एक बोझा लकड़ी के लिए
क्यों दिन भर जंगल छानती,
पहाड़ लाँघती,
देर शाम घर लौटती हो?
माँ कहती है :
जंगल छानती,
पहाड़ लाँघती,
दिन भर भटकती हूँ
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए।
कहीं काट न दूँ कोई...