अगर तुम जान जाओ तकलीफ मेरी, तो तुम्हें मेरे मुस्कुराने पर भी तरस आयेगा…

इंसां तिरे वुजूद का मक़सद ही इश्क़ था, तू नफ़रतों की राह में कैसे भटक गया ?

जब जब तुम ख़फा हुए हो मुझसे, तब तब ख़फ़ा हुई हूँ मैं खुद से 

हसीनों की गलियों से आँखें बंद कर गुज़रना  लड़ गयीं जो उनसे आँखें, गड्ढे में जा गिरोगे।

आजकल वो कुछ कहते नहीं है मशरूफियत है या नाराज़गी…?

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