आत्मबल को भेदती इस तीक्ष्ण गर्मी में, मानसूनी बारिश की पहली फुहार हो तुम...
हिम्मत इतनी थी की समुंदर भी पार कर सकते थे हम , मजबूर इतना हुआ की दो आंसुओ ने डूबो दिया ..!!
एक उम्मीद जगती हैं सुबह के साथ , कुछ करने की लकीर उभरती हैं सुबह के साथ , काली रातों से ना घबरा अरे यार , उजाले की उम्र बढ़ती हैं सुबह के साथ ।
मेरा धर्म बड़ा इस दंभ मे गला अपनो का रेत रहे,पहले मकां थे जो इंसान वो अब केवल खेत रहे,
शमसीर सी वाणी दिल मे नफरत कि आग है,कैसे रौशन होगा गुल यहा हर इंसान नाग है,
और अपने स्वार्थ मे निर्दोषो...
जिंदगी अपने रफ्तार से चल रही हैं, हम अपनी रफ्तार से चल रहे हैं, और समय........? वो तो बस मजे लिए जा रहा हैं।