इंतेहा हूँ मैं, तेरे इश्क़ के समुंदर में रहने वाला लवणीय जीव हूँ मैं

माना अगम अगाध सिंधु है, संघर्षों का पार नही है, किंतु डूबना मझधारो में, साहस को स्वीकार्य नहीं है.

मैं क्यों मान लूं तुम नहीं हो मेरे हाथ की लकीरों में, किस्मते तो उनकी भी होती है ना जिनके हाथ नहीं होते

कुछ भी अच्छा सा रख लीजिए मेम, वैसे भी करना उसके विपरित है !!

जो मेरे ख़यालात से रूबरू नहीं, वो मेरी मोहब्बत के लायक नहीं.

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