अगर मतलबी लोगों को खो देना एक हार है,
तो ऐसी हार हमें स्वीकार है
क्यों है
तेरा इन्तेजार ?
किस बात कि
है दरकरार ,, ?
जानता हूँ
कितनी ही सदायें दूँ
तू ना आएगा पलटकर
फिर भी क्यों है
जिया बेकरार
व्यर्थ है आशु
अब पिया मिलन
की आस,,,,,
आशु
रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुँह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा !
इतरा रहे हो ज़िस्म पर नए हो इश्क़ में
रूह के तलबगार से पाला नहीं पड़ा
शायद इसलिए .."शायरी" इतनी "खुबसूरत" होती है...
कभी सच ..छुपा लेती है तो.. कभी "शख्स".....