और आखरी में, वादों का महल ढह गया,दिल के हिस्से में सिर्फ़ तड़पना रह गया !!

ना मंदिर कि बात होगी ना शिवालय की बात होगी,प्रजा बेरोज़गार है निवालों की बात होगी

तुम्हारी नूर के दीदार को ,कहाँ रोक पायेगा हिजाब।दिल मेरा कहता है,क्यों ना दे दूँ तुम्हें,जन्नत की हूर का ख़िताब।।

वक़्त चलता गया पानी के नज़ारों की तरह चाहे कितना किया कश्ती से किनारा हमने याद है शाम वो ठहरी तेरी पहली वो नज़र तब से खोई है हर इक साँस हमारी हमने

अब वो किसी और से कहता होगातुम ही मेरी पहली और आखिरी मोहब्बत हो ...!!

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