सब नज़र का फेर है रावण की नज़र हो तो,राम भी गलत दिखेंगे.
एक छींक की तरहआ जाएगी मृत्युजेब में रूमाल तक नहीं होगा...
एक घुटन सी हो रही थी मुझे संपूर्ण रात्रि ,घबराहट सी हो रही थी अपने ही अंधेरे कमरे में....भोर की सुनहरी रौशनी आई एक हल्की दस्तक लिए ,उदासी तमाम मेरे कमरे के दरवाज़े से फ़ौरन ही विदा हो कर नई...
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने मेंतुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
क्रोध से शुरू होने वाली हर बात,लज्जा पर समाप्त होती है