उम्मीद हाथ पकड़ने की है,और लोग हैं कि कमज़ोर नस पकड़ते हैं।

हम उस दौर में जी रहे हैं दोस्त..जहाँ मासूमियत को बेवकूफी कहा जाता हैं..!!

कलियुग है करेला बनो..मिठाई बनोगे तो मिट जाओगे..!!

इतने सिद्दत से मेहनत करो तुम..कि तुमको कतरा नहीं तुमको समंदर मिले..

परिवार, हालात और रिश्ते जो संभालना चाहता है,वही झुक जाता है,वर्ना स्वाभिमान तो सुदामा का भी कहाँ कम था।

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