मुझको न गिनाओ मेरी कमियां क्या हैं, जाओ .....आईना देखो .. और अपने गुनाह गिनो..!

पिताजी के बाहर जाने पर मां कभी किवाड़ तुरंत बन्द नहीं करती थीं. खुली छोड़ देती थीं सांकल कभी कभी पिताजी कुछ दूर जाकर लौट आते थे कहते हुए.. कि कुछ भूल गया हूं और मुस्कुरा देते थे दोनों... मां ने सिखाया... किवाड़ की खुली सांकल किसी के लौटने...

जिस दिन सादग़ी श्रृंगार हो जायेगी... यक़ीन मानिये, उस दिन आईने की हार हो जायेगी

रास्ता मिल ही जाता है अगर हौसले बुलंद हो दीप आंधियों में भी जलते हैं अगर भावनाओं में बल हो

राम-राम के जाप में तेरे, पहले सा आराम नहीं, जबरदस्ती के जय श्री राम में, सब कुछ है बस राम नहीं

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