नज़रों से गुनगुना कर
कोई धुन तराशते हैं
जो अनजाने चेहरों में
खुशियाँ तलाशते हैं
अपनों में तो बस जिन्हें
ऐब ही दिखते हैं
वो गैरों की खातिर
बेकीमत बिकते हैं....
लोग पराए की तलाश में,
अपने खो देते हैं...
खतरा देखकर डसने वाले जीव जंगलों में रहते हैं,
और मौका देखकर डसने वाले मकानों में...
सितमगर हो तुम खूब पहचानते है
तुम्हारी अदाओ को हम जानते है
दगा बाज़ हो तुम सितम ढाने वाले..
परत चढ़ी है लाचारी की, आंखों से बहती अश्कों कि धार है,
सिकुड़ रही हैं आंतें भूख से, लेकिन मिलती सिर्फ दुत्कार है..!!