कभी कभी सोचता हूं इन ऊंची ऊंची, इमारतों में कितने गिरे हुए लोग रहते हैं...

यूँ तो अमरोहा से मेरा कोई नाता ना था फिर कमबख्त नामुराद मोहब्बत हुई और उसपर सितम तुझ बेवफा से हुई और हम खुद बे खुद जॉन ऐलिया के मुरीद हो गए

"मेरे खेत की मिट्टी से पलता है तेरे शहर का पेट मेरा नादान गांव अब भी उलझा है किश्तों में"

अगरबत्ती की तरह तुम्हें खुशबू ही देंगे, तुम शौक से चाहे जितना भी जला लो हमे।

जय किसान - जय युवा !!

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