कुछ दिली हसरतें कहें या ना कहें,या अनकहा सा कह दें,
उनसे उन्हीं का जिक्र करें या फ़िर हवाओं से कह दें,
प्रेम और अटैचमेंट में फर्क होता है...
प्रेम स्वतंत्र होता है..!!
तेरे इख़्तियार में क्या नहीं, मुझे इस तरह से नवाज़ दे
यूँ दुआएँ मेरी क़ुबूल हों, मेरे दिल में कोई दुआ न हो
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने
बस एक शख़्स को माँगा...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए