पिघल रही गलेशियर ...
दरारों को देखिए
बड़े बड़े चट्टान
टूटते देखिए
जलवायु परिवर्तन
मनुष्यता देखिए
अपने ही पैरों से
सकूं रौंदते देखिए
गगन चुंबी इमारत
आधुनिकता देखिए
छोड़ रहे दूषित वायु
परिवर्तन देखिए
विलुप्त जमी जंगल
मौसम देखिए
बेमौसम की मार
आफत देखिए ..!!
आँखों से निकले हर आँसू कोतलाश होती है अपनी एक मुस्कान की …
-मधुलिका
एक समंदर
मेरे अंदर
मस्त कलंदर...
उछल रहा है
उछल उछल कर
निगल रहा है
वक्त को
वक्त की बेवजह
पाबंदीओं को…
अंदर के
समंदर से
कभी
वक्त
कहां बड़ा हो पाया ❓
मैंने मुझको
हमेशा
वक्त से
बड़ा पाया
इस लिए
अंदर के समंदर में
वक्त को
डूबता पाया।।
कोई हुनर है तो एक दफा आज़मा लीजिये खुद को..
ये जिंदगी है , दुबारा सिर्फ कहानियों में मिलती है!!!
उम्मीदों के जंजाल में उलझे हुए हैं,अपनी ही आंखों में खोए हुए हैं…
प्रेम आपको डांट कर सुला देता है,
हवस रात भर जगाए रखती है.
दिल खोलकर तू चाहत का इज़हार करके देख…
नशा चाय से ज्यादा है इसमें, तू मुझसे प्यार करके देख…
रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुँह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा !
योजना के बिना
लक्ष्य सिर्फ इच्छा है
यदि आपके विचार सही, लक्ष्य ईमानदार और प्रयास संवैधानिक हों तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपकी सफलता निश्चित है।
बाल गंगाधर तिलक
किस जगह रहिये कहां दिन काटिये क्या कीजिएगावों मे कीचड बहुत है शहर में कम है हवा
गिरते हुए मैने जब भी तेरा नाम लिया है
गिरने ना दिया तुने मुझे थाम लिया है।।
ये कैसा भार हैं जब
मैं मुझमें ही रिक्त हूं..!!
फिर से उलझाता है सबको नफ़रत वाली बात में दूसरे राउंड में ही लुच्चा आ गया औक़ात में
ये तेरी झुकी हुई पलकें, ये कमसिन अदाएं,
आशिक तो तुझे देख कर ही घायल हो जाए..!!
विरक्ति
सोते को जगाया जा सकता है, पर कोई सोने का ढोंग करके पड़ा हो तो उसे कैसे जगाया जाए?
आँखें दिखाने पर हम रख देतें हैं मसल कर
वीरों की है ये धरती शत्रु रहें संभल कर
तुम्हारा इंतज़ार बिल्कुल वैसे ही करतीं हूँ, जैसे बचपन में करती थी पापा के दफ़्तर से लौट आने का ..!
कब कौन समेटता है यहाँ,खुद तोड़ कर पूछते है महफूज तो हो तुम…
अगर किरदार ऊंचा करना है तो अपना हुनर दिखाओ अपनी औकात नहीं..!!