सोचो तो सिलवटों से भरी है तमाम रूह
देखो तो इक शिकन भी नहीं है लिबास में
दरारें अपनों में, इस कदर ना बढने देना,
कि गैरों की जरुरत पड़े, मरम्मत के लिए....
मैं जानता हूं कहाँ तक उड़ान है उनकी,
ये मेरे हाथ से निकले हुए परिंदे है..
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
रहीमदास
सोचा था हर मोड़ पर याद करेंगे तुम्हे
लेकिन पूरा रस्ता ही सिदा था..
तुम्हारी गोद में सर रख के मेरा सोना..जैसे मानो एक पागल का ठीक होना..!!
यादों से न पूछें तरबियत उनकीये वो आजाद परिंदे हैं जो पल में सागर पार कर लेते हैं
राख बेशक हूँ मगर सुलगने की तमन्ना अभी भी है ,
जिसको जलना है वो हवा अभी भी दे सकता है ..!!
फिर आखरी बार भी नहीं मिला मुझसे, जो मिलने वाला था "उम्र भर के लिए"
बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने परजो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ !
मरम्मतें करके रोज थक जाता हूँ मैं,रोज मेरे अंदर नया नुक्स निकल आता है।
जिस शहर से कुंवारों को, मयस्सर न हो दुल्हन...
लाज़िम है कि उस शहर के मैरिज हाल गिरा दो.!
आप दीवार के चित्रों को बदल कर
इतिहास के तथ्यों को नहीं बदल सकते है।
जवाहरलाल नेहरू
खामोशी से खत्म हुए रिश्ते,
मन में गहरा शोर छोड़ जाते हैं।
मासिक वेतन पूरनमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते घटते लुप्त हो जाता है।
मुंशी प्रेमचंद
जिंदगी के रास्ते में सफर के मज़े लो,मंजिल तुमसे खुद किसी मोड़ पर टकराएगी ।
बड़े दाग हैं,इस सफेद लिबास में भी,कभी पोशाक को क़फ़न सेमिला कर तो देखिए !
बुराई पर अच्छाई की
असत्य पर सत्य की
अधर्म पर धर्म की
नफ़रत पर मोहब्बत की
जीत सदैव सुनिश्चित है
बाजार से खरीदी हुई मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर धन मांगते हो,
अगर मूर्ति धन देती तो दुकानदार इसे बेचता ही क्यों ??
मन करे कभी कुछ अच्छा करने का,
तो हांथ किसी विधवा का थाम लेना,
किसी बेसहारा अभागी स्त्री कि,
मांग फिर से तुम संवार देना,
और ये कैसा समाज है जो बेटे को,
दूसरे विवाह के लिए हां कहता है,
वहीं दिखाकर डर घर कि इज्ज़त,...