सुबह शाम तू मेरी इबादत सा लगे
जो कभी ना छूटे वो आदत सा लगे
तूने जो ना कहा मैं वो सुनती रही ख़ामख़ाह, बेवजह ख़्वाब बुनती रही जाने किसकी हमें लग गई है नज़र इस शहर में ना अपना ठिकाना रहा दूर चाहत से मैं अपनी चलती रही ख़ामख़ाह, बेवजह ख़्वाब बुनती रही ....
वाहेगुरु जी का खालसा,
वाहेगुरु जी की फतह
मां ममता की मूरत बन गयी,पिता संघर्ष के प्रतीक रह गए।चोट लगी तो मां के अश्रुधार बहे,पिता मौन में दुःख को सह गए।।
गुरुर है मुझे अपने भी किरदार पर , कोई तुमसा नहीं तो कोई मुझसा भी कहाॅ॓ है ..!!