हर स्त्री कुछ हद तक शिव के जैसी होती है,
क़तरा-क़तरा विष जीवनभर पिया करती है…
मशहूर तुम आज भी हो मेरे नाम सेपहचान तुम्हारा आज भी है मेरे नाम सेवेवफाइ का चादर ओढ़ तुम आए थे मेरे पासले कर चली गई सारी खुशियांखुदा ने जो रखा था मेरे नाम से…..
रहीसियत कि "रकम" से जाहिलों को "सरताज" बनते देखा है,
मैंने आज "हुनर" को नंगे पांव "तांत" पर उछलते देखा है..!!
मेरे ख्वाबो का कोई आशियाना नहीं हैं , अपने दर्दों को मुझे मिटाना नहीं हैं , मेरी मजबूरियों का फ़साना भी क्या अजीब हैं , मुझे रोना हैं पर किसी को बताना नहीं हैं ..
कितना बचा के रखते हैं हम समाज में अपनी छवि को,
जबकि बचाना हमें हमारे विचारों और कर्मों को चाहिए
अर्चना अनिरुद्ध
मजाक का सहारा लेकर लोग
दिल की बातें बोल जाते हैं...!!
आज फिर से ओढ़ ली उसनेख़ामोशी की चादरज़बान उसकी मगर चीखना चाहती थी
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँमाँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मेरे दोस्त गिरगिट की नस्ल के थे
एक एक करके सबने रंग दिखाए
मेरा ही फायदा लेकर मुझपर ही कुल्हाड़ी चलाते हो, कितने बेदर्द हो ए मानव तुम जख़्म देते ही रहते हो !!
सब दिल रखने की बाते हैं,
असली रूप सब छुपाते हैं !!
बस लिबास ही महंगा हुआ है...
लोग अभी भी दो कौड़ी के हैं...!
अपनी उदासी मुझे दे दे ,
मेरे हिस्से का तु मुस्कुराया कर।
औकात से बड़े दिखावे इंसान को, अक्सर कर्ज़ में डुबो देते हैं...