दुख, फरेब, गरीबी और बदनसीबी को मापना सिखाता हूं,
अपनी कलम कि धार से, मैं समाज को आईना दिखाता हूं..
उम्मीद कम रखिए,खुशियां बेहिसाब होंगी !
उस दिन पर लानत भेजता हूं..
जिस दिन पहली बार देखा था तुझे..!!
अब जो है, कुछ भी नहीं है हमारातेरा ख़्वाब आख़िरी था इन आँखों में_!!
टूटते पुल, धंसती सड़कें,टपकती छतें, बेपटरी ट्रेनें, बंद नाले, डूबते बेसमेंटझकझोर रहे हैं सबअब तो जागो कम से कमजनता हो तुम जागीर नहींकिसी रजवाड़े कीवोट जो देते रहोगेभ्रष्ट, निर्लज्ज, अक्षम प्रतिनिधियों कोधर्म और जाति के नाम परमरते रहोगे यूंही सब...
चिंतन से ही परिणाम को बदल सकते हैं…
चिंता से नहीं !!!
संघर्ष भी उन्हीं को चुनता है,
जिनमें लड़ने की क्षमता होती हैं।
ज़िंदगी शायद इसी का नाम है..दूरियाँ मजबूरियाँ तन्हाइयाँ….!!
महान व्यक्ति हमेशा योजना बनाकर कार्य करता है
जरूरतें, ख्वाहिशे, ज़िम्मेदारियां, यूंही तीन हिस्सों में दिन गुज़र जाता है..
समझने वाले ख़ामोशी भी समझ लेते हैं
और न समझने वाले
जज़्बात का भी मज़ाक बना देते हैं।
दवा की बोतलाे में प्यार भर के बेचो यार,
लोग बीमारी से नहीं तन्हाई से मारे जा रहे हैं...
जिसे कोई नहीं सुधार पता,उसे वक्त सुधार देता है…
इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ
अहमद फ़राज़
पल कितने है नहीं जानती हु
पर जितने है अच्छे है ये जानती हु
बहुत से लोग मिले
कुछ सबक सिखा के गए
कुछ से सबक सीख लिए गए ।।
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई...
सच बताओ खुद उदास रहकर भी दूसरो ,को खुश रखने की कोशिश करते हो ना !!
"बहुत कुछ टूटता है तब नया बनता है।"
~ गिरिजा कुमार माथुर
जिस शहर से कुंवारों को, मयस्सर न हो दुल्हन...
लाज़िम है कि उस शहर के मैरिज हाल गिरा दो.!
तुम लाख कोशिश कर लो इस्लाम का नामोनिशान मिटाने की,
लेकिन हकीकत यही है जुगनूओं के समूह से कभी जंगल नहीं जला करते।