फस गया हूँ जिंदगी के कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु की तरफ ,
बचाने कोई आने वाला नही और मैदान मैं छोड़ूंगा नही..
वक़्त चाहे कितना भी बदल जाए ,..पर चाय से मोहब्बत नहीं बदलेगी…!!
कि मरने के बाद भी मेरी आंख खुली रही,आदत जो पड गई थीं तेरे इंतज़ार की...
बहुत संभाल के हमनें रखे थे पाँव मगर ,
जहा थे जख़्म वही चोट बार - बार लगी ।।
औरत होना इतना आसान भी नहींआधे ख़्वाब दिल में ही दफ़न करने होते है….
मेरी बर्बादी चाहने वालों को मैंउम्र भर की मायूसी तोहफे में दूंगा!
बहुत आक्रामक, अभद्र और अपमानजनक लहजे
में बोलने का मतलब है कि,
अपनी बात पर भरोसा आपको कम है।
पंकज चतुर्वेदी
वाहेगुरु जी का खालसा,
वाहेगुरु जी की फतह
क्योंकि नहीं मिलते विचार तुम्हारे हमारे, अलग अलग रास्ते से क्यों ना पहुंचे हम मंज़िल तक
समाज की नज़र में दारू पीने वालेअमीर आदमी हैं तो ड्रिंक करता हैमिडिल क्लास हैं तो शराब पीता हैगरीब आदमी है तो वो बेवड़ा है
पिताजी के बाहर जाने पर मां कभी
किवाड़ तुरंत बन्द नहीं करती थीं.
खुली छोड़ देती थीं सांकल
कभी कभी पिताजी
कुछ दूर जाकर लौट आते थे
कहते हुए..
कि कुछ भूल गया हूं
और मुस्कुरा देते थे दोनों...
मां ने सिखाया...
किवाड़ की खुली सांकल
किसी के लौटने...
इतना कामयाब हर इंसान को बनना चहिए,
की आपके होते हुए,
आपके मां बाप को किसी और के आगे हाथ न फैलाना पड़े!..
ख्वाहिशें हमारी जितनी थी, अरमान हमारे खाक हुए,
मोहब्बत हमारी बढ़िया थी, हम समय के हांथों बर्बाद हुए..!!
विरक्ति
मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ मेंचाहा इधर घटा दिया चाहा उधर बढ़ा दिया
देखो, वो आ गया।
काली करतूतों को आसानी से ढक देता है।
सच पूछो तो 'कामयाबी ' भी एक परदा है।।
छोटी नदी को उमड़ते देर नहीं लगती
मुंशी प्रेमचंद
पुस्तक और प्रकृति से बेहतर दोस्त,इस दुनिया में और कोई नहीं !
जेहन में उसके नाज़ी का नायक इतराता हैपर होंटों से वो गांधी-गौतम को गाता है!
ज़रा अपना लहज़ा संभालो,
बातें नस्लो का पता देती हैं...