क्यूं सोचें, के चार लोग क्या कहेंगे?
समाज में महज़ चार लोग थोड़ी है।
ये कभी मत कहना कि वक़्त मेरे मुट्ठी में कैद है, मैंने मुंह से वापस निकलते निवाले देखें है
ख़ामोशी किसी की यूं ही बेहिसाब नहीं होती,
दर्द उनकी आवाज़ छीन लेते हैं
धागे बहुत कमज़ोर चुन लेते हैं हम,
और फिर सारी उम्र गाठ बांधने में गुज़र जाती है...
बहुत संभाल के हमनें रखे थे पाँव मगर ,
जहा थे जख़्म वही चोट बार - बार लगी ।।
संविधान केवल एक वकीलों का दस्तावेज नहीं है..
बल्कि यह जीवन का एक माध्यम है....!!
मां बाप की अहमियत उन औलाद से पूछो ,
जो मिलने के लिए कब्रिस्तान जाया करते हैं।।
जब जब तू गीत मोहब्बत के गाएगी,
मेरी रूह को अपने आसपास ही पाएगी,
और नहीं हुआ मुकम्मल इश़्क़ तो ग़म मत करना,
मैं मौजूद रहूंगा तेरे संगीत में, जब भी तू साज बजाएगी..!!
विरक्ति
महीनों बाद आज फिर देखा उसे,एक बार तो दिल धड़का मगर फिर संभल गया !!
कुछ ज़ख़्म भी ख़ामोश कर दिये जाते हैं
‘लोग क्या कहेंगे’ ये कहकरअपने ही उनका गला घोट जाते हैं
नियम के बिना और अभिमान के साथ
किया गया तप व्यर्थ ही होता है।
वेदव्यास
मैनें खुद को भी पढ़ कर देखा है..
सिवाये भरोसे और यकीन के कोई खता न था...
जीवन की असली पढ़ाई,पढ़ाई खत्म होने के बाद सुरू होती हैं…
आजकल हमें डुबाने की,नाकाम कोशिशें वही कर रहे हैं,जिन हरामखोरों को तैरना,हमने ही सिखाया था !!
आज ये दिल बेवजह ही खुश हैं
लगता है एक नया दर्द मेरे इंतजार में हैं
आप वो नहीं होते जो आप बतातें हैं
आप वो होते हैं जो आप छुपाते हैं
जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है
रामधारी सिंह दिनकर
लगता होगा चांद बहुत खूबसूरत है ,मगर लोगों ने तुम्हें देखा ही कहां है ।।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे
अगर मतलबी लोगों को खो देना एक हार है,
तो ऐसी हार हमें स्वीकार है