शहर से
सम्भावनाएं जुड़ी हैं ,
गॉंव से
भावनाएं जुड़ी हैं ।
पीड़ा कितनी भी हो अब हालातों से समझौता कर लेता हूं,
सुन ना सके कोई चीखें मेरी इसलिए होंठ सिल लेता हूं..!!
विरक्ति
चाय को तीसरी बार गर्म करके पिओगे
तो जहर बन सकती है
गालों पर उंगलियों की छाप
पीठ पर लात जूतों की बरसात
होंठों पर दाँतों के निशान
मुख की कोरों से बहता रक्त
कानों में गूँजती
रिश्तों को शर्मशार करती
हुईं गालियाँ
'उन दिनों'.
उसकी टाँगों के नीचे
आने से मैंने मना क्या कर दिया
बस..
उसने एक चुटकी...
मैं किसी और की तरफ देखूंगी भी नहीं,तुम आराम से कामयाब होकर आना….
मानता हूं मिजाज में सख्ती है मेरे मगर,
मैं इज्जत देने वालों की इज्जत करता हूं.
तुम जाग रहे हो मुझमें
अधूरे ख़्वाबों की तरह.!
फंस गयी है मेरे जीवन की गुत्थी, अब तू सुलझा दे मुझे, अगर मुमकिन हो तो अपनी जुल्फ़ों कि लटों में उलझा ले मुझे..!!
प्यार की बातें करके, बस हवस मिटाते हैं लोग...
जिंदगी और चाय में एक बात तो है ,
जब मजा आने लगता है ख़त्म हो जाती है ।।
पन्नों के परे भी है एक ज़िंदगी
सभी किरदार किताबों में नहीं होते
मेरी ख्वाहिशों का शहर बहुत बड़ा थापर अब जिम्मेदारी की गलियों में अटक गया हूँ
मूर्खो से तारीफ सुनने से बेहतर है,
कि बुद्धिमान से तुम डांट सुन लेना..!!
रखें हैं मैंने भी कुछ खत संजो कर उसकी याद में,
खुशी से कभी पागल ना हो जाऊं इसलिए पढ़ लेता हूं..!!
विरक्ति
ये सोचना ग़लत है कि तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बे-ख़बर नहीं.
आलोक श्रीवास्तव
तुमने मेरी आंख में शाय़द झांक कर नहीं देखातुम मेरे करीब से इतना बचकर निकल गये
चलो अच्छा हुआ कि एक न हो पाये हम, एक हो कर भी कभी तुम कहाँ मेरे होते ~अर्चना अनिरुद्ध
मंज़िल को अगर पाने की होड़ है
तो फिर क्या फर्क पड़ता कि राहों मे कितनी मोड़ है
पैसा इन्सान को ऊपर जरूर ले जाता हैं,
परंतु इंसान पैसे को ऊपर नहीं ले जा सकता....
अगर होता दिलों के पास कोई कान,तो आँखों की ख़ामोशी भी सुनी जाती.!