चुपके से भेजा था गुलाब उसे...खुशबु ने पूरे मोहल्ले मे शोर मचा दिया...
दुनिया में लोग बुद्धि अपने पास,
और धन दूसरों के पास ज्यादा समझते हैं।
जिसकी जेब में पैसा न हो,
उसकी ज़बान में शहद होना चाहिए !
इतने सिद्दत से मेहनत करो तुम..कि तुमको कतरा नहीं तुमको समंदर मिले..
हमारा चरित्र कितना ही दृढ़ हो, पर उस पर संगति का असर अवश्य होता है।"
प्रेमचन्द
किताबों में झुके हुये सर…
ज़िन्दगी भर उठे रहते हैं।।
ख्वाहिशें अनेक हैं "मन" में,
लेकिन परिस्थितियां "दम" तोड़ रही हैं,
खुशियां दिखा कर "मुकद्दर",
मेरे सारे "ख्वाब" तोड़ रही हैं,
घर "जर्जर" है, बहन भी "ब्याहना" है,
लेकिन ये "मुफलिसी" भी भारी है,
मध्यम वर्गीय "पुरुष" के कांधे पर
"परिवार" सबसे बड़ी जिम्मेदारी है..!!
विरक्ति
जो गलत है उसका विरोध खुलकर कीजिए, चाहे राजनीति हो या समाज इतिहास आवाज उठाने वालों पर लिखा जाता है तलवे चाटने वालों पर नहीं।
नहीं करते शरीक तेरे ख्याल में किसी और को,
हम तेरे ख्याल का भी बहुत ख्याल रखते हैं !!!
जो इज़्ज़त देगा उसे इज़्ज़त मिलेंगी...
हम हैसियत देखकर सिर नहीं झुकाते...
क्यूँ हर दफ़ा ख़ुशियों की क़ीमत आंसुओं से चुकानी पड़ती है..?
और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देताहाथ रख देती हैं दिल पर तेरी बातें अक्सर..!!
मेरी आस्तीन में ऐसे सांपों का बसेरा है, मेरे मुंह पर मेरा है 'तेरे मुंह पर तेरा है !!
तस्वीर तो है ही तुम्हारी है तारीफ-ए-काबिलउससे भी ज्यादा कातिल है होंठों के नीचे ये काला तिल🧚🏻♀️
माँ
एक बोझा लकड़ी के लिए
क्यों दिन भर जंगल छानती,
पहाड़ लाँघती,
देर शाम घर लौटती हो?
माँ कहती है :
जंगल छानती,
पहाड़ लाँघती,
दिन भर भटकती हूँ
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए।
कहीं काट न दूँ कोई...
ख़ामोशी को चुना है मैंनेक्योंकि बहुत कुछ सुना है मैंने!
मेरे गाँव का मौसम बसंत हो गया है,यानी, तुम शहर से गाँव आई हो।
ना किया कोई सिंगार फिर भी गम नहीं ,
गरीब बाप की बेटी परी से कम नहीं ।।