शहर में रहकर...वो सोशल मीडिया पे फादर्स डे का जश्न मना रहा था, उधर गांव मे एक बूढ़ा बाप आज भी टकटकी लगाए बैठा है !!
जिंदगी एक खेल है और ये आप पर निर्भर करता है , खिलाड़ी बनना है या खिलौना......!!
रूद्र हुँ,महाकाल हुँ,मृत्यु रूप विकराल हुँ,नित्य हुँ, निरंतर हुँ, शांति रूप मे शंकर हुँ,
शांति का श्रृंगार हुँ,मै क्रोध का अंगार हुँ,
घनघोर अंधेरा ओढ़ के मै जन जीवन से दूर हुँ,शमशान मे नाचता मै मृत्यु का गरूर हुँ,
शाम दाम तुम रखोंमै...
जिन पेड़ो ने पतझड़ सहे हैं,
बसंत भी उन्हीं पेड़ो पर आता है....
एक हमारे उठने से क्या होता है,
आंख दुनिया की भी तो खुलनी चाहिए...
रिश्ते भी इमारत की तरह होते हैं ,
हल्की-फुल्की दरारें नज़र आए तो इमारत तोड़िये नहीं
मरम्मत कीजिए !
हिसाब भरी ज़िन्दगी को बेहिसाब जिया जाए ,
महीना सावन का आ गया है महादेव से इश्क किया जाए ..!!
जब तक इंसान मजबूत नही होता,तब तक इंसान मजबूत नहीं होता ।
हमें प्रेम करना चाहिए, न कि प्रेम में गिरना चाहिए,क्योंकि जो कुछ भी गिरता है, वो टूट जाता है.
शहर से अच्छा तो अपना गाँव है,
जहाँ हम मकान नम्बर से नहीं
‘पिता’ के नाम से पहचाने जाते हैं.
ज्यादा Available होने से भी,
इंसान की Value घट जाया करती हैं...
उनको भी हैप्पी होली,
जो मौका देख कर किसी और कि होली...
उम्र कटी दो अल्फाज में,एक आस में दूसरा काश में….
वतन के जाँ-निसार हैं वतन के काम आएँगे,
हम इस ज़मीं को एक रोज़ आसमाँ बनाएँगे!
उम्मीद कम रखिए,खुशियां बेहिसाब होंगी !
घर वालों को ज़रूर बताइए उलझने अपनी,मर जाने से अच्छा है उनके लिए जिया जाए….
जाने किन रिश्तों में रिश्ते ढूंढ़ रहे हैं,
आदम हैं हम और फरिश्ते ढूंढ़ रहे हैं...
अनुभव उम्र से नहीं..
परिस्थितियों का सामना करने से आता है..!!
जाने क्या बिगाड़ा है इस बनाने वाले नेहम बनते बनाते अनजान बन जाते हैं !!
मुझे मम्मी की बहुत याद आ रही हैअपने होने वाले बच्चों की...