आखिर में ज़िंदगी चंद सवाल,
और कुछ जवाब बनकर रह जाती हैं...
तुम ने तो सितारों को दूर ही से देखा है,तुम समझ न पाओगे आसमां की तनहाई…
अकेला इंसान और वीरान मकान एक सा होता है
जहां वह स्वयं के प्रश्नों का स्वयं ही उत्तर होता है
राजेश गौरी
यह कविता नहीं
जीवन का सार है
जिसने ख़ुद को ना चाहा
उसका जीना बेकार है
सौ सितारों के जहां भी
उसके लिए अंधकार है
जो ख़ुद को ना चाहे
खुद को
सजा दे
जो खुद को ना चाहे
किसी को क्या
ख़ुशी दे
जो खुद को खुशी दे
मोहब्बतें जगा दे
जो खुद...
गोबर पर चांदी का वर्क लगाने से हलवा नहीं बनता!!
फिर एक दिन वो लोग हमेशा के लिए सो जाते हैं ,
जिनको रात भर नींद नहीं आती !
वो रूठी ही रहेगी, उसे खबर भी नहीं होगीमुझे कब? कहाॅं? किस लम्हें दफ़नाया गया
छत पर वॉक करने वाला मौसम है,
और छत से छलांग लगाने वाले हालात.
नशा सूरत का होता तो कब का उतर गया होता ,
मुझे तलब तो उसकी सादगी की है ..!!
मुनासिब समझो तो मुझे अपनी आंखों पर होंठ रखने दो
ये डार्क सर्कल सिर्फ खीरे से ठीक नही होंगें
तुम्हारे लिए किताब का कोई हिस्सा है मोहब्बत
हमारे लिए ईमान का हिस्सा है मोहब्बत ।।
बादलों की ओट से सूरज निकलने वाला है ,
सफर जारी रखो वक्त बदलने वाला है ..!!
ठहरूँ न गली में तेरी वहशत ने कहा थामैं हद से गुज़र जाऊँ मुहब्बत ने कहा था
जिनको हर मोड़ पे कोई मिल जाएउनको पुराने रास्ते क्या ही याद रहेंगे!!
गिले शिकवे मिटा कर सोया करो मौत मुलाकात का मौका नहीं देती…
मरने वाला तो मर गया लौट कर नहीं आएगापर अपनी सोचो उसके चले जाने की टीस जीने नही देगी होगी घुटन पर कह नहीं पाओगे
लाख रोओगे पर उसे वापस...
आते नहीं हैं लोग असल किरदार में कभी, यहाँ एक से बढ़कर एक अदाकार हैं सभी
क्यूं सोचें, के चार लोग क्या कहेंगे?
समाज में महज़ चार लोग थोड़ी है।
परेशानी यह नहीं की दिन बुरे चल रहें, मसला ये है कि दिन भी जवानी के हैं ..!!
वजह तक पूछने का मौका ना मिला।बस दिन गुजरते गए और हम अजनबी होते गए।।