ग़ुरूर में बन्दा खुद को
हर इक से जुदा समझता है
अधूरा आदमी ख़ुद को
ख़ुदा समझता है
अभी ख़मोश हूं तो
ताअल्लुक़ की ज़िंदगी के लिए
ख़बर नहीं वो मेरी चुप्पी को
क्या समझता है।
बेटे खुश ना भी हों तो कौनसा, घर वालों को पता चलने देते हैं....
चले जाना चाहता हूँ
बहुत दूर...
जहाँ कोई भी न हो!
चले जाना चाहता हूँ
उन बर्फीली पहाड़ियों के अनज़ान सफ़र पर
जिसका कोई अंत न हो!
मैं ख़ुद को भी भूल जाना चाहता हूँ!
परिन्दों की तरह सब कुछ छोड़
आसमां में उड़ना चाहता हूँ!
न्यायार्थ अपने बन्धु को भी दण्ड देना धर्म है।
मैथिलीशरण गुप्त
यह जो काया की माया हैइसी में संसार समाया है।
~प्रियदर्शन
मुस्कान को तमीज चाहिएआंसुओ को तन्हाई
अकेला पन जब काटने लगा
तो बचपन की याद आई
भीड़ बहुत है आसपास सबके
पकड़े है कोई न कोई हाथ भी
दिल ने जब सुकून चाहा
याद मां की गोद ही आई
हां खुश हूं में कहता है हर कोई
हंसी...
बारिश की बूंदों ने शब ए फुरकत का रंज कुछ यूं आसान कर दियामेरे अश्क़ छुप गए और मैं तन्हा रह गया….!
कमजोर लोग बदला लेते हैं.
ताकतवर लोग माफ कर देते हैं.
बुद्धिमान लोग नजरअंदाज कर देते हैं।"
अल्बर्ट आइंस्टीन
कहां से लायी हो इतनी खूबसूरत आंखें…सारे जहां की खूबसूरती समेटे हुए..कौन कहता है कि छोटे कपड़ों में ही सुंदर दिखा जा सकता है.. मर्यादा , संस्कारों में रहकर पूरे कपड़ों में भी सिर्फ आंखों से ही चांद सी खूबसूरत...
अगर आप मोहब्बत में बेवक़ूफ़ नहीं हो सकते , तो आप मोहब्बत नहीं कर सकते...
एक ही समझने वाला था मुझे ,
हाय !अब वो भी समझदार हो गया ।।