दर्द का कहर बस इतना सा है,कि आँखें बोलने लगी और आवाज रूठ गई ..

किसी की परवरिश पर उंगली उठाने से पहले स्वयं के संस्कारों का भी आंकलन कर लेना चाहिए...

बचपन के घाव अच्छे थे,बस घुटनों पर ही लगते थे..

शीशे टूटने के बाद कहाँ जुड़ पाते हैं जो जुड़ भी जाए तो एक ही अक्स हज़ार नजर आते हैं।

टूटे तो बिखर जगाओगे...अंत में तबाह ही हुऐ हैं बिखरने वाले !

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