मैं ढूंढती हूं खुद में...खुद को ही,शायद मैं वो नहीं जो हुआ करती थी..!!

चक्रव्यूह रचने वाले सारे अपने ही होते हैं , कल भी यही सच था और आज भी यही सच है ...

हंसकर जीना ही दस्तूर है जिंदगी का,एक यही किस्सा मशहूर है जिंदगी का...

हमारी खामोशी को हरगिज बुझदिली ना समझा जाये,,,अभी हम तेरे जुल्म और अपने सब्र की इंतहा देख रहे है,,

रूठे हुओ को मनानाऔर गैरो को हसाना हमे पसंद नही...

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