मुझ पर तरस खाने वाले लोगहद्द से ज़्यादा बुरे लगते हैं मुझे
जीवन अपूर्ण लिए हुएपाता कभी खोता कभीआशा निराशा से घिराहँसता कभी रोता कभीगति-मति न हो अवरूद्धइसका ध्यान आठो याम हैचलना हमारा काम हैइस विशद विश्वप्रहार मेंकिसको नहीं बहना पडासुख-दुख हमारी ही तरहकिसको नहीं सहना पडाफिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँमुझपर विधाता...
इंसानों का सताया हुआ हूँ साहबसो इंसानों पर रहम नहीं करूंगा
खूब समझती है वो रूदन अपने लाल का,"मां" पृथ्वी पर साक्षात् भगवान होती है,
घर, समाज, ईश्वर किसी का उसे भय नहीं,अपनी औलाद में ही उसकी जान होती है,
और नहीं करती फिक्र कभी धूप - शीत की,हर आफत से बचा ले...
तेरे !!! सजदे मे सर रख के मौला मेैंअपने सारे गमों को भूल जाता हूं…