पुरानी और नई पीढ़ी की सोच का अंतराल हीआज में "पिता" और "बेटे" के बीच की दूरी है
"कुछ अजीब सा चल रहा है ये वक्त का सफर ,एक गहरी सी खामोशी है खुद के ही अंदर !!
कुछ होगाकुछ होगा अगर मैं बोलूँगान टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता कामेरे अंदर एक कायर टूटेगा -टूट मेरे मन टूटएक बार सही तरहअच्छी तरह टूटमत झूठमूठ - ऊब मत रूठमत डूब, सिर्फ टूट
~ रघुवीर सहाय
चांद नहीं, सूरज नहीं,एक छोटा सा ख्वाब मांगा था,इक उम्र नहीं, कुछ साल नही,दो पल का साथ मांगा था,कोई नाम नही, कोई लफ्ज़ नही,बस इक एहसास तो मांगा था।।
न हो सका तुमसे इतना भी,कुछ ज्यादा नहीं…बस बेकरारी में करार मांगा...
भरोसे का पात्र नहीं रहता वो व्यक्ति ,जो भावनाओ के साथ खेल गया हो !!