महरुमीयों की अपनी कोई इंतेहा नहीं ,कभी चेहरा नही, तो कभी आईना नही ।तुम जिस से कर रहे हो मेरे हक में बद्दुआ ,मेरा भी है खुदा, वो फकत तुम्हारा नही ।

इत्र,परफ्यूम से सिर्फ़, लिबास मेहकता है, क़िरदार नहीं।

कुछ रिश्ते आजकल उस रास्ते पर जा रहे हैं,न साथ छोड़ रहे हैं, और न ही साथ निभा पा रहे हैं…

मैंने ताले से सीखा है साथ निभाने का हुनरवो टूट गया पर चाभी नहीं बदली…!!

कभी कभी किसी के शब्द इतनेचुभ जाते हैं कि हमचुप से हो जाते हैं और सोचते हैं किहम इतने बुरे हैं…….

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