हम सब लहू निचोड़ दें खिदमत में बाप की ,
उतरेगा सर से फिर भी न एहसान बाप का ।।
मुझे मालूम था मेरी मंज़िल "मौत" है,
फिर भी चाह "जीने" की करता रहा,
मुझे नहीं थी परख सही या ग़लत की,
मैं गुस्ताखी पर गुस्ताखी करता रहा,
और जब "जुदा" हुआ उनसे तब मैंने जाना,
सफ़र में तो वो थे "ठोकरें" मैं खाता रहा..!!
दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि अगर तुम किसी एक ही नजरिए का दामन थामे रहोगे,
तो आगे नहीं बढ़ सकते।
देख कर परेशान हूं रिवाज दुनिया का
अब जूठ बोलकर भी लोग शर्मिंदा नहीं होते।