अरे नासमझ है, नादान है, वो मन कि कच्ची हैं अभी, पढ़ ना सकी कसीदे मेरे इश़्क़ के, शायद वो बच्ची हैं अभी..!! विरक्ति

मेरे दिल मे मत झांकना धुंआ बहुत है , बची कुची ख्वाइशें जला रही हूँ मैं ।।

मुकद्दर कि चोट ऐसी खाई थी मैंने,आज हर कदम पर फिसल रहा हूं,कभी झूठे सुख, तो कभी झूठी हंसी लिये,मैं किरदारों पर किरदार बदल रहा हूं..!!

लकड़ी के कीड़े पूरी कुर्सी खा जाते हैं... और कुर्सी के कीड़े पूरा देश....!!

मेरे लिए इतिहास केवल हमारे मिलन की बेला रही , और गणित तुम्हारा मुझ से रूठने मनाने का फलसफा , भूगोल की कक्षा मे मैंने केवल तुम्हारी मुझ से दूरी को ही नापा , मैंने तुम्हारे प्रेम मे अपने वाक्यों का पूर्णविराम कभी नही खोजा :) मेरे हर सवाल...

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