गिरगिट तो बेवजह बदनाम है,
असली रंग तो अपने बदलते हैं...
उसके आने की उम्मीद ही नही
तो उसकी आदत कैसी..
जब वो अपना ही नही
तो शिकायत कैसी..
गुलामी के दावत से बेहतर हैं,
आज़ादी की सुखी रोटी...
एक गुमनाम सा किरदार,
हमारा भी हैं कहीं,
जज्बात तो बहुत हैं,
मगर हक एक भी नहीं,
करना तो बहुत कुछ हैं किसी एक की खातिर,
मगर मन इसी कश्मकश में हैं कि उनके जीवन में,
हमारा कोई अस्तित्व भी तो नहीं कही ..
पिता के अलावा और कोई नहीं चाहता ,
कि आप उससे ज्यादा तरक्की करे ..!!