हसीनों की गलियों से आँखें बंद कर गुज़रना  लड़ गयीं जो उनसे आँखें, गड्ढे में जा गिरोगे।

आजकल वो कुछ कहते नहीं है मशरूफियत है या नाराज़गी…?

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है, माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।

आते नहीं हैं लोग असल किरदार में कभी, यहाँ एक से बढ़कर एक अदाकार हैं सभी

मेरा संघर्ष एक दिन मुस्कुरायेगा, पाँव से काँटा ख़ुद ही निकल जायेगा

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