कितनी मासूम है एक तरफ़ा मोहब्बत वैसे खेलता रहता है ... मैदान में बच्चा तन्हा

जो कुछ भी हूॅं पर यार गुनहगार नहीं हूॅं, दहलीज़ हूॅं दरवाजा हूॅं पर दीवार नहीं हूॅं !!

वैसे तो बहुत बुरा हूॅं मैं लेकिन दो चेहरे नहीं रखता !!

तूने जो ना कहा मैं वो सुनती रही ख़ामख़ाह, बेवजह ख़्वाब बुनती रही जाने किसकी हमें लग गई है नज़र इस शहर में ना अपना ठिकाना रहा दूर चाहत से मैं अपनी चलती रही ख़ामख़ाह, बेवजह ख़्वाब बुनती रही ....

तरस आता है अपने बाप पर, उसे औलाद मुझ जैसी मिली.

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