कृष्ण में लीन मीरा
कृष्ण-प्रेम में मग्न है रहती
सुधबुध है खोई अपनी
बावरी कृष्ण-भजन में डूबी रहती
दरस की अभिलाषी मीरा
विष को भी अमृत मान है पी लेती
मोह कहाँ है उसे इस जग से
हर साँस वो गिरधारी को समर्पित करती
ऐसी है दर्श दिवानी...
पता है मुझे ऐ ज़िन्दगी
कदम कदम पर
तू मुझे रुलायेगी
मगर याद रख
तेरे ज़ुल्मों सितम की उम्र है छोटी
मेरे होंठों की हंसी से
तू पल पल मात खायेंगी
अंत का भी एक अंत होता हैं,
कुछ भी कहाँ अनंत होता हैं...
किरदार कितना भी साफ क्यों ना हो,
लोग वही सोचेंगे जो उनके मन में होगा…
सिर्फ नंबर 'डिलीट' करने से यादें मिट पायी है क्या ?