जिंदगी भी किताब सी होती है.... सब कुछ कह देती है खामोश रह के भी..!!

मैं तुम्हारे साथ हूॅं कहने में और रहने में बहुत फर्क होता है !!

सच की तपस्या से बेहतर है, झूठ से सन्यास ले लिया जाए.

जब चली थी ख़ुद को ढूंढने, नही जानती थी, कि अपने आप को दूसरो में, नही खोजा करते।

लिखते क्यों नहीं मुझे फिर दोबारा फिर एक बार मुझे अधूरा होना है !

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