तमाम इश्क के शहर मालिक अब आग में जलते हैंमज़हब के पैरों से लोग आशिकों के सर कुचलते है

घाव के ठीक हो जाने से,हादसे भूले नहीं जाते...

चलो अपने अपने गिरेबाँ में हम झाँक आते हैंकहीं हम ही तो नहीं हैं बे-ग़ैरत सबसे ज्यादा

मेरे मुस्कुराने और खुश रहने में बड़ा अंतर है, जिस दिन तुम समझ जाओगे... यकीनन लौट आओगे.!!

हर दरबार में जाकर माँगा हैं तुम्हें, प्रसाद मिल जाता है पर तुम नहीं

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